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मकर संक्रांति पर्व.. पतंगों से सजा आसमान.. श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा में लगाई आस्था की डूपकी..

अब 54 वर्षों तक 15 जनवरी को ही मनेगी मकर संक्रांति : भारत कृषि प्रधान देश यह पर्व नई फसल के स्वागत का प्रतीक



रिपोर्टर : दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597

मनावर। जिला धार।। मकर संक्रांति सनातन संस्कृति का एक अतत पावन और शुभ पर्व है। जो प्रकृति, सूर्य उपासना और मानव जीवन के बीच संतुलन को प्रदर्शित करता है। यह त्यौहार भारत के विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल तथा असम में माघ बिहू के नाम से जाना जाता है। लेकिन इस पर्व का मूल भाव एक ही है, और वह है; सूर्य देव की उपासना और दान-पुण्य करना। यह पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही मनाया जाता है। यह वह क्षण होता है, जब सूर्य उत्तरायण होते हैं और खरमास के बाद शुभ काल आरंभ होता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय आत्मशुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। मकर संक्रांति पर्व 14 और 15 जनवरी को श्रद्धाभाव से मनाया गया। इस दिन का पुण्य काल 14 जनवरी को दोपहर 03:13 बजे से आरंभ हुआ। रात्रि 9.48 पर सूर्य, मकर राशि में प्रवेश करने के कारण मकर संक्रांति का पुण्य काल 15 जनवरी को सूर्योदय से दोपहर 1.50 तक रहा। शास्त्रों के अनुसार इस दिन किया गया स्नान-दान और पूजा कई गुना पुण्य फल प्रदान करती है। माना जाता है कि इस शुभ काल में दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। साधक के जीवन में सुख समृद्धि का वास होता है।

*मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व* मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व अत्यंत गहन है। यह पर्व उत्तरायण की शुरुआत का प्रतीक है, जब सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होते हैं। उत्तरायण को आध्यात्मिक उन्नति का काल माना गया है। इस समय किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल शीघ्र प्राप्त होता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा, यमुना, सरस्वती अथवा किसी भी पवित्र जल स्रोत में स्नान करने से मनुष्य के समस्त पापों का क्षय होता है। साथ ही ब्राह्मणों, साधुओं और दीन-दुःखी, निर्धन, जरूरतमंद लोगों को दान देने से भगवान सूर्य की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

*मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व* मकर संक्रांति का उल्लेख अनेक पौराणिक कथाओं में मिलता है। महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने उत्तरायण काल की प्रतीक्षा करते हुए अपने प्राण त्यागे थे। मान्यता है कि उत्तरायण में देह त्याग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण इस काल को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। कृषि प्रधान भारत में मकर संक्रांति का विशेष सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। यह पर्व नई फसल के स्वागत का प्रतीक है। किसान इस दिन प्रकृति और सूर्य देव का आभार व्यक्त करते हैं। सूर्य देव को जीवन, ऊर्जा, सत्य और तप का प्रतीक माना गया है, इसलिए इस दिन उनकी विशेष आराधना की जाती है। इस दिन श्रद्धालुजन पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करते है। समीपस्थ ग्राम बड़दा, सेमल्दा स्थित पुण्य पावन मां नर्मदा नदी पर पहुंचकर स्नान, दान पुण्य किया गया। बच्चों ने आसमान में सप्तरंगी पतंगे उड़ाई। गौ शालाओं में गायों को हरी घास खिलाई गई। गरीबों को वस्त्र, कम्बल, अनाज का दान दिया गया। मंदिरों में गुड़, तिल्ली के लड्डू का भोग भगवान लगाया। सूर्य देव को अर्ध देकर तिल के लड्डू, खिचड़ी और व्यंजन अर्पित किए। सूर्य चालीसा, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ किया गया। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है, जिसका पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। इस दिन दीन-दुःखी, असहाय और जरूरतमंदों की सेवा करने से भगवान सूर्य देव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

*दान का महत्व* बताया जाता है कि इस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है। खिचड़ी का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का दान करने से धन, यश और मान-सम्मान में वृद्धि होती है। इस दिन किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराना मां अन्नपूर्णा की कृपा प्राप्त करने का उत्तम माध्यम माना गया है। वस्त्र दान का भी विशेष महत्व है। गरीबों, वृद्धों और जरूरतमंदों को नए वस्त्र, सर्दी में कंबल या स्वेटर का दान करना पुण्यकारी माना जाता है। ऐसा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।

*2008 से आरंभ हुआ बदलाव चलेगा 2080 तक* ग्रहों के राजा सूर्य 14 जनवरी की रात्रि 9:48 बजे धनु से मकर राशि में प्रवेश करेंगे और संक्रांति का पुण्यकाल 16 घंटे तक यानी अगले सूर्योदय के बाद 15 जनवरी को दोपहर बाद तक मनाया गया। बताया जाता है कि सूर्य की चाल और राशियों में संक्रांति को ज्योतिषीय गणित की दृष्टि से अगले 54 वर्षों तक यानी वर्ष 2080 तक मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी। इसके बाद फिर ज्योतिष गणना के अनुसार मकर संक्रांति एक दिन और आगे बढ़कर 16 जनवरी को हुआ करेगी।

*प्रत्येक 72 वर्ष में बदल जाती है संक्रांति की तिथि* प्रतिवर्ष सूर्य के राशि परिवर्तन में 20 मिनट का विलंब होता है। इस प्रकार तीन वर्षों में यह अंतर एक घंटे का हो जाता है। 72 वर्षों में 24 घंटे का अंतर आ जाता है। सूर्य व चंद्रमा ग्रह मार्गीय होते हैं। यह पीछे नहीं चलते हैं, इसलिए इनकी संक्रांति का समय 72 वर्षों में एक दिन बढ़ जाता है। इस दृष्टि से यह 72 साल वर्ष 2008 से 2080 तक बदलाव चलेगा। हालांकि छह वर्षों तक सूर्य का राशि परिवर्तन प्रातः काल में होने से पूर्व काल मानकर मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाती थी। इसके पहले सूर्य का राशि परिवर्तन संध्याकाल में होता था। वर्ष 1936 से मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जा रही थी। इससे पहले 1864 से 1936 तक 13 जनवरी और 1792 से 1863 तक 12 जनवरी को मनाई जा रही थी। वर्ष 1863 में 12 जनवरी को जब स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था, उस दिन मकर संक्रांति का पर्व था।

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